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आदि पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
क्रोधवर्धन इत्येव यस्त्वन्यः परिकीर्तितः |  ४४   क
दण्डधार इति ख्यातः सोऽभवन्मनुजेश्वरः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति