शान्ति पर्व  अध्याय ६१

भीष्म उवाच

स्वदारतुष्ट ऋतुकालगामी; निय़ोगसेवी नशठो नजिह्मः |  ११   क
मिताशनो देवपरः कृतज्ञः; सत्यो मृदुश्चानृशंसः क्षमावान् ||  ११   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति