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शान्ति पर्व
अध्याय ६१
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भीष्म उवाच
एवं हि यो व्राह्मणो यज्ञशीलो; गार्हस्थ्यमध्यावसते यथावत् |  १६   क
गृहस्थवृत्तिं प्रविशोध्य सम्य; क्स्वर्गे विषुद्धं फलमाप्नुते सः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति