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अनुशासन पर्व
अध्याय ६१
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भीष्म उवाच
हलकृष्टां महीं दत्त्वा सवीजां सफलामपि |  २८   क
उदीर्णं वापि शरणं तथा भवति कामदः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति