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शान्ति पर्व
अध्याय २१०
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गुरुरु उवाच
भवान्तप्रभवप्रज्ञा आसते ये विपर्ययम् |  २३   क
धृत्या देहान्धारय़न्तो वुद्धिसङ्क्षिप्तमानसाः |  २३   ख
स्थानेभ्यो ध्वंसमानाश्च सूक्ष्मत्वात्तानुपासते ||  २३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति