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शान्ति पर्व
अध्याय १२४
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प्रह्राद उवाच
ते विस्रव्धाः प्रभाषन्ते संय़च्छन्ति च मां सदा |  ३४   क
ते मा कव्यपदे सक्तं शुश्रूषुमनसूय़कम् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति