आश्वमेधिक पर्व  अध्याय ६१

वैशम्पाय़न उवाच

एवं पितामहेनोक्तो धर्मात्मा स धनञ्जय़ः |  १६   क
त्यक्त्वा शोकं महाराज हृष्टरूपोऽभवत्तदा ||  १६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति