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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
सुवहूनि च राजेन्द्र दिवसानि विराटजा |  ८   क
नाभुङ्क्त पतिशोकार्ता तदभूत्करुणं महत् |  ८   ख
कुक्षिस्थ एव तस्यास्तु स गर्भः सम्प्रलीय़त ||  ८   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति