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सभा पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
भारद्वाजोऽपि सर्वेषामाचार्यः कृप एव च |  १४   क
अत एतावपि प्रश्नं नाहतुर्द्विजसत्तमौ ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति