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शल्य पर्व
अध्याय ६३
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सञ्जय़ उवाच
केशान्निय़म्य यत्नेन निःश्वसन्नुरगो यथा |  ५   क
संरम्भाश्रुपरीताभ्यां नेत्राभ्यामभिवीक्ष्य माम् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति