सभा पर्व  अध्याय ६१

वैशम्पाय़न उवाच

मन्यसे वा सभामेतामानीतामेकवाससम् |  ३४   क
अधर्मेणेति तत्रापि शृणु मे वाक्यमुत्तरम् ||  ३४   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति