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सभा पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
यच्चैषां द्रविणं किञ्चिद्या चैषा ये च पाण्डवाः |  ३७   क
सौवलेनेह तत्सर्वं धर्मेण विजितं वसु ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति