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सभा पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
शशाप तत्र भीमस्तु राजमध्ये महास्वनः |  ४३   क
क्रोधाद्विस्फुरमाणोष्ठो विनिष्पिष्य करे करम् ||  ४३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति