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वन पर्व
अध्याय २५५
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वैशम्पाय़न उवाच
तौ शरैरभिवर्षन्तौ जीमूताविव वार्षिकौ |  १७   क
एकैकेन विपाठेन जघ्ने माद्रवतीसुतः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति