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सभा पर्व
अध्याय ६१
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विदुर उवाच
सभां प्रपद्यते ह्यार्तः प्रज्वलन्निव हव्यवाट् |  ५३   क
तं वै सत्येन धर्मेण सभ्याः प्रशमय़न्त्युत ||  ५३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति