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सभा पर्व
अध्याय ६१
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प्रह्लाद उवाच
यो वै प्रश्नं न विव्रूय़ाद्वितथं वापि निर्दिशेत् |  ६६   क
के वै तस्य परे लोकास्तन्ममाचक्ष्व पृच्छतः ||  ६६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति