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सभा पर्व
अध्याय ६१
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कश्यप उवाच
जानन्न विव्रुवन्प्रश्नं कामात्क्रोधात्तथा भय़ात् |  ६७   क
सहस्रं वारुणान्पाशानात्मनि प्रतिमुञ्चति ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति