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आश्वमेधिक पर्व
अध्याय ७२
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वैशम्पाय़न उवाच
याज्ञवल्क्यस्य शिष्यश्च कुशलो यज्ञकर्मणि |  १७   क
प्राय़ात्पार्थेन सहितः शान्त्यर्थं वेदपारगः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति