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वन पर्व
अध्याय ६१
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दमय़न्त्यु उवाच
उत्तरन्तं नदीं रम्यां प्रसन्नसलिलां शुभाम् |  १०७   क
सुशीततोय़ां विस्तीर्णां ह्रदिनीं वेतसैर्वृताम् ||  १०७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति