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वन पर्व
अध्याय ६१
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दमय़न्त्यु उवाच
कासि कस्यासि कल्याणि किं वा मृगय़से वने |  ११३   क
त्वां दृष्ट्वा व्यथिताः स्मेह कच्चित्त्वमसि मानुषी ||  ११३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति