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वन पर्व
अध्याय ६१
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दमय़न्त्यु उवाच
यक्षी वा राक्षसी वा त्वमुताहोऽसि वराङ्गना |  ११५   क
सर्वथा कुरु नः स्वस्ति रक्षस्वास्माननिन्दिते ||  ११५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति