वन पर्व  अध्याय ६१

दमय़न्त्यु उवाच

यदि जानीत नृपतिं क्षिप्रं शंसत मे प्रिय़म् |  १२०   क
नलं पार्थिवशार्दूलममित्रगणसूदनम् ||  १२०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति