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वन पर्व
अध्याय ६१
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दमय़न्त्यु उवाच
साव्रवीद्वणिजः सर्वान्सार्थवाहं च तं ततः |  १२४   क
क्व नु यास्यसि सार्थोऽय़मेतदाख्यातुमर्हथ ||  १२४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति