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वन पर्व
अध्याय ६१
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सार्थवाह उवाच
सार्थोऽय़ं चेदिराजस्य सुवाहोः सत्यवादिनः |  १२५   क
क्षिप्रं जनपदं गन्ता लाभाय़ मनुजात्मजे ||  १२५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति