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अनुशासन पर्व
अध्याय ११२
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वृहस्पतिरु उवाच
अधर्मेण समाय़ुक्तो यमस्य विषय़ं गतः |  ३७   क
महद्दुःखं समासाद्य तिर्यग्योनौ प्रजाय़ते ||  ३७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति