वन पर्व  अध्याय ६१

दमय़न्त्यु उवाच

न मे त्वदन्या सुभगे प्रिय़ा इत्यव्रवीस्तदा |  २०   क
तामृतां कुरु कल्याण पुरोक्तां भारतीं नृप ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति