वन पर्व  अध्याय ६१

दमय़न्त्यु उवाच

निषधाधिपतेर्भार्यां नलस्यामित्रघातिनः |  ३२   क
पतिमन्वेषतीमेकां कृपणां शोककर्शिताम् |  ३२   ख
आश्वासय़ मृगेन्द्रेह यदि दृष्टस्त्वय़ा नलः ||  ३२   ग
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति