वन पर्व  अध्याय ६१

दमय़न्त्यु उवाच

भगवन्नचलश्रेष्ठ दिव्यदर्शन विश्रुत |  ३९   क
शरण्य वहुकल्याण नमस्तेऽस्तु महीधर ||  ३९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति