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शान्ति पर्व
अध्याय २९
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वैशम्पाय़न उवाच
अनतिक्रमणीय़ो हि धर्मराजस्य केशवः |  ५   क
वाल्यात्प्रभृति गोविन्दः प्रीत्या चाभ्यधिकोऽर्जुनात् ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति