वन पर्व  अध्याय ६१

दमय़न्त्यु उवाच

वीर विक्रान्त धर्मज्ञ सत्यसन्ध महीपते |  ५३   क
यद्यस्यस्मिन्वने राजन्दर्शय़ात्मानमात्मना ||  ५३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति