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वन पर्व
अध्याय ६१
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दमय़न्त्यु उवाच
तैरुक्ता कुशलं भद्रे सर्वत्रेति यशस्विनी |  ६७   क
व्रूहि सर्वानवद्याङ्गि का त्वं किं च चिकीर्षसि ||  ६७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति