वन पर्व  अध्याय ६१

दमय़न्त्यु उवाच

उदर्कस्तव कल्याणि कल्याणो भविता शुभे |  ८७   क
वय़ं पश्याम तपसा क्षिप्रं द्रक्ष्यसि नैषधम् ||  ८७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति