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वन पर्व
अध्याय २६६
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मार्कण्डेय़ उवाच
हनूमत्प्रमुखाश्चापि विश्रान्तास्ते प्लवङ्गमाः |  ३०   क
अभिजग्मुर्हरीन्द्रं तं रामलक्ष्मणसंनिधौ ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति