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विराट पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
तथा विसञ्ज्ञेषु परेषु पार्थः; स्मृत्वा तु वाक्यानि तथोत्तराय़ाः |  १२   क
निर्याहि मध्यादिति मत्स्यपुत्र; मुवाच यावत्कुरवो विसञ्ज्ञाः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति