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विराट पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
लव्ध्वा तु सञ्ज्ञां च कुरुप्रवीरः; पार्थं समीक्ष्याथ महेन्द्रकल्पम् |  १९   क
रणाद्विमुक्तं स्थितमेकमाजौ; स धार्तराष्ट्रस्त्वरितो वभाषे ||  १९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति