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विराट पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
तद्भीष्मवाक्यं हितमीक्ष्य सर्वे; धनञ्जय़ाग्निं च विवर्धमानम् |  २४   क
निवर्तनाय़ैव मनो निदध्यु; र्दुर्योधनं ते परिरक्षमाणाः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति