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द्रोण पर्व
अध्याय १६४
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सञ्जय़ उवाच
न चैनं संय़ुगे कश्चित्समर्थः प्रतिवीक्षितुम् |  ६५   क
न चैनमर्जुनो जातु प्रतिय़ुध्येत धर्मवित् ||  ६५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति