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द्रोण पर्व
अध्याय २५
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सञ्जय़ उवाच
तोमरैः सूर्यरश्म्याभैर्भगदत्तोऽथ सप्तभिः |  ३१   क
जघान द्विरदस्थं तं शत्रुं प्रचलितासनम् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति