विराट पर्व  अध्याय ६१

वैशम्पाय़न उवाच

दृष्ट्वा प्रय़ातांस्तु कुरून्किरीटी; हृष्टोऽव्रवीत्तत्र स मत्स्यपुत्रम् |  २९   क
आवर्तय़ाश्वान्पशवो जितास्ते; याताः परे याहि पुरं प्रहृष्टः ||  २९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति