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विराट पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
द्रोणः कृपश्चैव विविंशतिश्च; दुःशासनश्चैव निवृत्य शीघ्रम् |  ५   क
सर्वे पुरस्ताद्विततेषुचापा; दुर्योधनार्थं त्वरिताभ्युपेय़ुः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति