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विराट पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
स तान्यनीकानि निवर्तमाना; न्यालोक्य पूर्णौघनिभानि पार्थः |  ६   क
हंसो यथा मेघमिवापतन्तं; धनञ्जय़ः प्रत्यपतत्तरस्वी ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति