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विराट पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
ते सर्वतः सम्परिवार्य पार्थ; मस्त्राणि दिव्यानि समाददानाः |  ७   क
ववर्षुरभ्येत्य शरैः समन्ता; न्मेघा यथा भूधरमम्वुवेगैः ||  ७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति