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विराट पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
ततो दिशश्चानुदिशो विवृत्य; शरैः सुधारैर्निशितैः सुपुङ्खैः |  ९   क
गाण्डीवघोषेण मनांसि तेषां; महावलः प्रव्यथय़ां चकार ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति