अनुशासन पर्व  अध्याय १४

वासुदेव उवाच

हिरण्यकशिपुर्योऽभूद्दानवो मेरुकम्पनः |  ५२   क
तेन सर्वामरैश्वर्यं शर्वात्प्राप्तं समार्वुदम् ||  ५२   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति