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उद्योग पर्व
अध्याय ६१
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वैशम्पाय़न उवाच
आवन्त्यकालिङ्गजय़द्रथेषु; वेदिध्वजे तिष्ठति वाह्लिके च |  १६   क
अहं हनिष्यामि सदा परेषां; सहस्रशश्चाय़ुतशश्च योधान् ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति