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वन पर्व
अध्याय २४४
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वैशम्पाय़न उवाच
तानव्रवीत्स राजेन्द्रो वेपमानान्कृताञ्जलीन् |  ३   क
व्रूत यद्वक्तुकामाः स्थ के भवन्तः किमिष्यते ||  ३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति