द्रोण पर्व  अध्याय ६१

धृतराष्ट्र उवाच

श्वोभूते किमकार्षुस्ते दुःखशोकसमन्विताः |  १   क
अभिमन्यौ हते तत्र के वाय़ुध्यन्त मामकाः ||  १   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति