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शल्य पर्व
अध्याय ५९
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राम उवाच
धर्मार्थौ धर्मकामौ च कामार्थौ चाप्यपीडय़न् |  १८   क
धर्मार्थकामान्योऽभ्येति सोऽत्यन्तं सुखमश्नुते ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति