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द्रोण पर्व
अध्याय ६१
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धृतराष्ट्र उवाच
धर्मापेक्षो नरो नित्यं सर्वत्र लभते सुखम् |  ३०   क
प्रेत्यभावे च कल्याणं प्रसादं प्रतिपद्यते ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति