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द्रोण पर्व
अध्याय ६१
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धृतराष्ट्र उवाच
अर्हन्त्यर्धं पृथिव्यास्ते भोक्तुं सामर्थ्यसाधनाः |  ३१   क
तेषामपि समुद्रान्ता पितृपैतामही मही ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति